मृदुला गर्ग की कहानी ‘वसु का कुटुम’ – मूल संवेदना | Vasu ka Kutum – By Mridula Garg

मृदुला गर्ग की कहानी ‘वसु का कुटुम’ – मूल संवेदना | Vasu ka Kutum – By Mridula Garg

मृदुला गर्ग समकालीन महिला लेखिकाओं में एक विशिष्ट स्थान रखती हैं | बहुचर्चित औपन्यासिक रचनाओं के अतिरिक्त हिंदी कहानी के क्षेत्र में भी शसक्त रचनाएँ देकर उन्होंने हिंदी साहित्य जगत में अपना महत्वपूर्ण हस्ताक्षर दिया है | अपने निजी जीवन के साथ-साथ अपनी रचनाओं में भी अपने विचारों को बेख़ौफ़ होकर बयां करना उनकी खासियत रही है | वर्ष 2016 में प्रकाशित उनकी कहानी ‘वसु का कुटुम’ इस बात का परिचायक है | उम्र के इस पड़ाव पर भी लेखन से जुड़े रहना उनकी हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और लेखन के प्रति उनके समर्पण के भाव को दर्शाता है |

कहानी का नाम (Story Name)वसु का कुटुम (Vasu ka Kutum)
लेखक (Author)मृदुला गर्ग (Mridula Garg)
भाषा (Language)हिन्दी (Hindi)
प्रकार (Type)स्त्री विषयक (Stree Vishyaka)
प्रकाशन वर्ष (Year of Publication)1996

 इस कहानी की पात्र ‘दामिनी’ जिसे दिल्ली में हुए बहुचर्चित निर्भया–कांड की पीड़िता के जीवित रहने के उपरांत उसके संभावित जीवन और उससे जुड़ी कठिनाईयों तथा उसके प्रति समाज के व्यवहार की कल्पना के साथ गढ़ा गया है। इस पात्र के साथ खास बात यह है कि कुछ ज्यादा ही खास बनाने के चक्कर में इसे ज्यादा नाटकीय तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसे संतुलित और संजीदा ही रखा गया है। यह एक आम धारणा है कि बलात्कार होने के पश्चात्‌ एक स्त्री का मनोबल इस हद तक क्षीण हो जाता है कि वह फिर कभी भी भावनात्मक रूप से खड़ी नहीं हो सकती। उसका खंडित हुआ आत्मविश्वास उसे पुरूषों खासकर प्रभावी पुरूषों से जूझने, वाद–विवाद करने अथवा अपने अधिकारों के लिए लड़ने का दुःसाहस नहीं करने देता। यह कहानी ऐसी सभी धारणाओं को झूठा साबित करती है। साथ ही यह कहानी हमारे समाज में व्याप्त हर स्तर पर, सुनियोजित रूप से, सांठ–गांठ के साथ किए जाने वाले भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करती है। पत्रकारिता से जुड़े लोगों में समाचार आदि को अधिक सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत किए जाने की चाह, टी.आर.पी. की भूख के चलते गिरते हुए पत्रकारिता के स्तर आदि को अपनी कहानी के माध्यम से प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही दामिनी का सच जानने के बावजूद ‘राघवन’, ‘रत्नाबाई’ और ‘नजमा’ का उसे सहज ही परिवार का हिस्सा मान लेना यह दर्शाता है कि आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो भावानात्मक संबंधों को तवज्जो देते हैं |

कहानी का प्रारंभ ऐसे प्रसंग से होता है जिसमें बी.के. सपोत्रा नामक बिल्डर भवन के निर्माण का कार्य सभी नियमों को ताख पर रखते हुए मनमाने ढंग से करता है। मुनाफाखोरी के नशे में वह उसके काम से होने वाली आम लोगो की दिक्कतो की जरा भी परवाह नहीं करता है। उसने यह जमीन चमनदास के बेटों से खरीदी है। ‘चमनदास’ जिसे बगीचे का बहुत ही शौक है, वह अपने छोटे से लॉन में हर हफ्ते मोअर चलाता है जिसे उसके अपने बच्चे तथा पड़ोसी आदि मात्र एक घास का टुकड़ा कह कर उसका मखौल उड़ाते हैं। लोगों का यह व्यवहार एक दूसरे के प्रति संवेदनहीनता का परिचायक है। चमनदास की मृत्यु के उपरांत उसके बच्चे अपनी माँ की अनदेखी कर उसके मौन को सहमति मानते हुए पुराने घर को बी.के. सपोत्रा नामक बिल्डर को बेंच देते हैं। मृदुला जी लिखती हैं–

“विधवा की अनकही मंजूरी से बेटों ने घास के लॉन और सब्जी–फूल की क्यारी समेत घर बिल्डर को बेंच दिया। चार तल्लों में से दो तल्ले दोनों बेटों के नाम होने वाले थे । बेवा का क्या था, दोनों में से किसी के मकान में पड़ी रहती।”1

वसु का कुटुम- मृदुला गर्ग

आज भी हमारे समाज में लोग स्त्री और उपर से विधवा–स्त्री के प्रति संवेदनहीन हैं तथा उसके अधिकारों की अनदेखी करते हैं |

बिल्डर बी.के. सपोत्रा कानून और निर्माण संबंधी सभी नियमों की अनदेखी करते हुए मनमाने ढंग से निर्माण कार्य करता रहता है। आस–पास के बाशिन्दे भी धूल–मिट्टी से हो रही परेशानियों को सहते रहते हैं तथा वे अपने कानूनी अधिकारों के प्रति अति–उदासीन हैं । किसी में भी विरोध करने का साहस नहीं है। वे जानते हैं कि–

“ऐतराज करने से कुछ होने वाला है नहीं। …..पुलिस वाले आएँगे । डाँटेंगे–डपटेंगे और रिश्वत लेकर चलते बनेंगे।”

वसु का कुटुम- मृदुला गर्ग

लोग पुलिसिया–तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के सामने नतमस्तक होकर जीते चले जा रहे हैं। किसी में भी या तो इसका प्रतिकार करने का साहस नहीं है या लोग इसके आदी हो चुके हैं।

इसी कॉलोनी में नायिका ‘दामिनी’ रहने के लिए आती है जो एक बलात्कृत स्त्री है। हाजिरजवाब, तेजतर्रार, सही को बेहिचक सही और गलत को बेहिचक गलत कहने वाली स्त्री है। लोग प्रायः यही धारणा बांधे रहते हैं कि स्त्री पर यदि बलात्कार हुआ हो या उसे किसी भी अन्य प्रकार की प्रताड़ना दी गई हो तो वह पुनः खड़ी होने का मनोबल नहीं जुटा पाती। वह सवर्था सामान्य जीवन जीने का साहस खो बैठती है। अतः दामिनी के बलात्कृत स्त्री होने की संभावना को उसके आस–पास के लोग नकार देते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि–

“बलात्कृत स्त्री डरी–सहमी रहती है। इस तरह झगड़ा करती नहीं घूमती। वह भी रौबदार मर्दों से।”

वसु का कुटुम- मृदुला गर्ग

अतः दामिनी का अपेक्षाकृत विपरीत स्वभाव उसे समाज में बलात्कृत होने के कारण की जाने वाली अवहेलना तथा तंज भरी दृष्टि से महफूज रखता है।

दामिनी दुकानदार ‘राघवन’ से हरदम किसी न किसी बात को लेकर झिक–झिक करती है। ‘राघवन’ दामिनी से होने वाली नोंक–झोंक के बूते ही अनजाने में दामिनी से एक अनकहा भावनात्मक जुड़ाव महसूस करने लगता है तथा उसे भी  दामिनी को उल्टे–सीधे जवाब देने में आनंद आता है। काफी समय तक दामिनी के दुकान पर न आने के कारण राघवन इसका कारण जानने का प्रयास करता है तथा दामिनी के घर जाने पर उसे विदित होता है कि वह काफी बीमार है, अतः वह ‘रत्नाबाई’ नामक स्त्री को उसके घर काम पर रखवा देता है । दामिनी बिल्डर बी.के. सपोत्रा से भी कानून का अनुसरण न करते हुए निर्माण स्थाल के चारो ओर घेरा न बनाने के मुद्दे को लेकर विवाद में पड़ती है | उसकी शिकायत को बिल्डर द्वारा तवज्जो न दिए जाने पर वह सम्बंधित विभागों के अलग-अलग अधिकारियों के पास अपनी शिकायत दर्ज कराती है | किन्तु भ्रष्ट महकमे के कानो पर जूं तक नहीं रेंगती |

दामिनी जब इस बात की पुष्टि करती है कि वो वाही दामिनी है जिसके साथ दिल्ली में वह दुर्घटना हुयी थी टैब राघवन विचलित हो जाता है | दामिनी बताती है कि जिस लड़की को ताम-झाम के साथ सिंगापुर इलाज के लिए ले जाया गया था वह दामिनी नहीं, कोई और लड़की थी | यहाँ लेखिका बताती हैं कि किस प्रकार सरकारी और राजनैतिक महकमा अपनी साख बचाने के लिए समस्या के निदान की जगह लिपा-पोती करता है |

राघवन यह सब सुनकर अविश्वास के भाव से भर जाता है | वह इस बात पर यकीन नहीं कर पाता है कि जिस लड़की के साथ इतना सब कुछ हुआ हो, वह कभी भी इतनी जीवट नहीं हो सकती | उसे तो मर्दों से घिन हो जाती होगी | कैसे वह किसी मर्द के साथ हंसी ठट्ठा कर सकती है | राघवन का यह सोचना इस इस पुरुष मानसिकता का परिचायक है कि यदि किसी औरत को इतनी प्रताड़ना दी जाय तो वह हर हाल में टूट जाती है | इसके प्रत्युत्तर में रत्ना बाई कहती है –

“भईया, जिस औरत को मार-मूरकर गेर दिया जाए, उसे किसी का डर नहीं रहता और वो बहुत जीवट की हो जाती है | “

वसु का कुटुम- मृदुला गर्ग

रत्नाबाई के इस कथन के माध्यम से मृदुला जी का यह विचार दृष्टिगोचर होता है कि यह आवश्यक नहीं स्त्री पर किया गया शोषण उसे कमजोर ही बनता है, बल्कि इसके विपरीत वह उसे और अधिक जुझारू, कठोर तथा निर्भीक भी बना सकता है | उस स्त्री में गलत के प्रतिकार का अदम्य सहस भी भर सकता है |

दामिनी की तबीयत ज्यादा ख़राब हो जाने पर राघवन, रत्नाबाई तथा नज्म उसे लेकर अस्पताल पहुँचते हैं | डॉक्टर द्वारा पूछे जाने पर रत्नाबाई स्वयम को उसकी माँ, नजमा उसकी बहन तथा राघवन को उसका भाई बताते हैं | वे सभी बड़ी ही सहजता से अकेली दामिनी के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेते हैं | वहीँ दूसरी ओर दामिनी के एन.जी.ओ. की कर्ता धर्ता ‘मीरा राव’ दामिनी के इलाज के लिए चंदा इकठ्ठा करती है जिसमे राघवन भी अपनी गिन्नी को दान में दे देता है | इलाज से पूर्व ही दामिनी की मृत्यु हो जाती है | अपनी गिन्नी वापस मांगने पर मीरा राव उसे कागजी कार्यवाही के नाम पर टाल मटोल करती रहती है | क्रोधित रत्नाबाई जब मीरा राव के ऑफिस पहुँचती है तो उसे ज्ञात होता है कि दामिनी की मृत्यु के उपरांत भी उसके नाम पर दान लिया जा रहा है | एन.जी.ओ. के दफ्तर में जब उसे ज्ञात होता है कि बी.के. सपोत्रा की मौत हो गयी है तो वह खुशी से नाचने लगती है क्योंकि वह उसे ही दामिनी की मौत के लिए जवाबदार मानती है | एन.जी.ओ. के दफ्तर में ही रत्नाबाई की भी मौत हो जाती है |

मृदुला गर्ग ने अपनी इस कहानी में मिडिया में व्याप्त शोबाजी की ललक, खबरों की संजीदगी की अपेक्षा लोकप्रियता की भूख को भी उजागर किया है | रत्नाबाई तथा एन.जी.ओ. के घटनाक्रम का विडियो लेकर जब चपरासी ‘रामलखन’ न्यूज़ चैनल के दफ्तर में जाता है, तब प्रोड्यूसरों के समूह की इस टी आर पी के भरपूर मसाले को देखकर बांछे खिल जाती हैं | उनमें से एक कहता है –

“एक दिक्कत है, इसके जो सबसे धांसू दो किरदार थे, वे तो आउट हो चुके हैं | एक वह लड़की ….. और वह एक बुढिया …. सनसनी पैदा करने के लिए सिर्फ मजमून काफी नहीं होता |सनसनाते हुए किरदार भी चाहिए; वे कहाँ से लायेंगे ?”

वसु का कुटुम- मृदुला गर्ग

दामिनी और रत्नाबाई की मृत्यु, मीरा राव का भ्रस्टाचार में लिप्त होना वगैरह इन संवेदनहीन, मुनाफाखोर लोगों के लिए सनसनी पैदा करने के साधन मात्र हैं | आगे की जिम्मेदारी ‘हिन्दीश’ नामक खोजी पत्रकार पर छोड़ दी जाती है | कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए राघवन को भी बुलाया जाता है जो गिन्नी को दान में देने की बात का खुलासा पत्नी के समक्ष हो जाने के भय से कार्यक्रम में जाने से मन कर देता है | बाद में नजमा की सलाह मानकर पत्नी नीलम को सारा वृतांत बता देता है | हिन्दीश राघवन की पत्नी, नजमा, राम लखन आदि को बारी-बारी अपने कार्यक्रम में बुलाकर चर्चा करवाता है | मीरा राव समेत एन.जी.ओ. के अन्य सभी जवाबदेह लोग विदेश जा बैठते हैं | हिन्दीश मीरा राव को ढूंढता हुआ दुबई पहुँचता है जहाँ वह कबूल करती है कि वह एन.जी.ओ. का पैसा बी.के.सपोत्रा के बिज़नेस में इन्वेस्ट करती थीं जिसका उन्हें तगड़ा ब्याज दिया जाता था | इस बात से सपोत्रा का बेटा पूरी तरह मुकर जाता है | बाद में यह भी ज्ञात होता है कि सपोत्रा को निर्माण सम्बन्धी क़ानूनी अनुमति कभी मिली ही नहीं | यह हमारे कानून व्यवस्था के लचीलेपन पर एक करारा तमाचा है | नजमा भी मीडिया के नब्ज को अच्छी तरह जानती है, अतः वह उसके सामने बहस के दौरान, उनकी आवश्यकता के अनुरूप हो ख़बरें परोसती रहती है | बाद में चैनलों पर राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों के बीच होने वाली बहस, आरोप-प्रत्यारोप के बीच एन.जी.ओ. तथा सपोत्रा के भ्रष्टाचार, रूपयों के गबन आदि प्रासंगिक मुद्दे अपने आप ही धुआं हो जाते हैं |

‘वसु का कुटुम’ कहानी मृदुला गर्ग की अन्य रचनाओं की ही भांति नारी के जीवट, निर्भीक तथा जुझारू स्वरूप का चित्रण करने के साथ – साथ राजनीतिक, सरकारी और पुलिसिया तंत्र, भवन निर्माण के व्यवसाय से जुड़े लोगों के साथ-साथ सेवा के नाम पर धन बटोर रहे एन.जी.ओ. आदि में सुनियोजित रूप से किये जाने वाले भ्रष्टाचार आदि का पर्दाफाश करने में पूर्ण-रूपेण सफल रही है |


Dr. Anu Pandey

Assistant Professor (Hindi) Phd (Hindi), GSET, MEd., MPhil. 4 Books as Author, 1 as Editor, More than 30 Research papers published.

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