वंशज उपन्यास : मृदुला गर्ग | Vansaj Upnayas By : Mridula Garg

वंशज उपन्यास : मृदुला गर्ग | Vansaj Upnayas By : Mridula Garg

मृदुला गर्ग कृत वंशज उपन्यास एक नवीन कथावस्तु तथा नवीन समस्याओं को लेकर प्रस्तुत हुआ है, जिसमें वर्तमान पीढ़ी द्वारा विरासत में मिली नौकरशाही का डटकर किये जाने वाले विरोध का चित्रण किया गया है। उपन्यास का ढाँचा कानपुर में रहने वाले शुक्ल जी नामक जज को लेकर खड़ा किया गया है। शुक्ला जी अंग्रेजों के समय के अंग्रेजियत से पूरी तरह से भरे हुए हैं। शुक्ला जी अंग्रेजी शासन की नीतियों का पूरी तरह से अनुगमन करते हैं। इस उपन्यास का कथ्य समाजशास्त्र, राजनीति एवं मनोविज्ञान आदि के अनेक पहलुओं को उद्घाटित करता है।

उपन्यास का नाम (Novel Name)वंशज (Vansaj)
लेखक (Author)मृदुला गर्ग (Mridula Garg)
भाषा (Language)हिन्दी (Hindi)
प्रकाशन वर्ष (Year of Publication)1976

वंशज उपन्यास की कथा वस्तु

वर्तमानयुगीन समस्याओं में मूल्य-विघटन, दो-पीढ़ियों के बीच का टकराव आदि ऐसी ज्वलंत समस्याएँ हैं जो न जाने कितने ही घरों में अपनी जड़ें जमाकर बैठ गयी हैं। वंशज उपन्यास में दो पीढ़ियों के बीच जिस द्वन्द्व को प्रस्तुत किया गया है, उन्हीं में से एक है, पिता-पुत्र के बीच होने वाला टकराव सुधीर के पिता जो कि एक उच्च पद प्राप्त कानपुर सेशन कोर्ट के जज तथा अंग्रेजी सभ्यता के हिमायती हैं। जज साहब सुधीर को कुछ बनाना चाहते हैं, जिससे वे सुधीर को सदा ही अनुशासन में बाँधे रखते हैं किन्तु सुधीर अपने पिता की अति-अनुशासनप्रियता तथा अंग्रेजियत के ओड़े हुए नकाब का विरोध करता है। सुधीर को बचपन से ही अपने पिता से प्यार के बदले प्रताड़ना प्राप्त होती है, जिसकी वजह से वह अपने पिता से सदैव नफरत ही करता है और यही नफरत पिता-पुत्र के मध्य तनाव का कारण बनती है। इसके अतिरिक्त पिता-पुत्र के बीच तनाव व द्वन्द्व के अनेक कारणों को चित्रित किया गया है। इस द्वन्द्व का एक कारण सुधीर के जीवन में माँ का न होना एवं पिता प्रेम से वंचित रहना भी है। डॉ. सोनवणे जी का कहना है- “पिता और माता के सम्पर्क में तनाव और राहत का अनुभव करते हुए पुत्र पिता की दृष्टि से अनद्रत और माता की दृष्टि से समना बनकर विकसित होता है। वंशज के सुधीर को तनाव और राहत का संतुलित जीवन उपलब्ध न रहा |

उपन्यास की कई घटानायें सुधीर की मानसिक विकृति को बढ़ाती हैं, जैसे- पिता द्वारा उसकी बहन रेवा को दिया जाने वाला स्वयं से अधिक प्रेम असफल वैवाहिक जीवन मास्टर श्रीवास्तव जी द्वारा पिटाई आदि। पिता के प्रेम के अभाव में सुधीर स्वयं समाज की ओर उन्मुख होता है। सुधीर एक शिक्षित युवा है जो स्वयं अपना निर्णय लेने में सक्षम है। वह पुरानी मान्यताओं, परम्पराओं को खोखली मानता है। मजदूरों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करता है। मजदूरों का आर्थिक शोषण, देश की स्वतंत्रता, नारी शिक्षा, अर्थ-जागृति स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों में बदलाव और त्रासदी आदि अनेक बिन्दुओं को उपन्यास की कथा के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।

इस उपन्यास के प्रमुख पात्र हैं- सुधीर, शुक्ला साहब, सविता, रेवा, संदीप आदि। इसके अतिरिक्त विमला, विजय, फिलिप, मास्ट साहब आदि गौण पात्र हैं। सुधीर उपन्यास का प्रमुख पुरुष पात्र है। बचपन से ही पिता का कठोर व्यवहार अति अनुशासन प्रियता, विद्यालय के गणित के मास्टर साहब द्वारा पिटाई आदि अनेक बातें उसके अन्तर्मन में कुंठा, अकेलापन एवं मानसिक संत्रास उत्पन्न करती हैं । सुधीर के मानसिक स्थिति का प्रभाव उसके बाह्य व्यवहार में भी दिखाई देता है। बचपन में ही माता की मृत्यु के पश्चात् उसे पिता के द्वारा तिरस्कार एवं प्रताड़ना ही मिलती है। पिता से आक्रोशित होने के कारण वह उन्हें ‘डैडी’ के बजाय ‘साहब’ कहकर सम्बोधित करता है। सुधीर के मनोभावों को लेखिका ने निम्न शब्दों में उभारा है-

“शायद उसके मन के भीतर गहरे आक्रोश की जो लपट धधक उठती, वही उसे रोने-चीखने जैसा मामूली काम करने से रोक देती।”

सुधीर की बहन को परिवार में अधिक महत्व दिया जाता है । उसके पिता हमेशा से ही उसकी अपेक्षा उसकी बहन रेवा को अधिक लाड़-प्यार देते हैं। सुधीर अपने पिता के इस व्यवहार को समझ नहीं पाता । सुधीर धनबाद में स्वयं के बल पर नौकरी करता है, किन्तु वहाँ भी वह अकेलापन, अजनबीपन ही महसूस करता है । उसकी मानसिक दशा धीरे-धीरे खराब होती चली जाती है । अर्थलोलुप उसकी पत्नी सविता भी पति से सरोकार नहीं रखती । वह सिर्फ और सिर्फ धन की ही भूखी जान पड़ती है । सविता अत्यन्त ही स्वार्थी, अर्थलोलुप किन्तु व्यावहारिक स्त्री है। वह अपने स्वार्थपूर्ति हेतु मानवीय सम्बन्धों की भी परवाह नहीं करती। वंशज में शुक्ला साहब की बहू सविता रुपयों के मामले में अधिक चौकन्ना रहती है। सुहागरात में सुधीर की ऊंगली में सगाई की अंगूठी न देखकर वह चिन्तित हो उठती है।

अंग्रेजियत से भरपूर शुक्ला साहब एक ओर न्यायप्रियता की वकालत करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपने ही लड़के-लड़की में फर्क करते हैं। रेवा अपने आप को भारतीय नारी के अनुरूप प्रत्येक परिस्थिति के अनुरूप ढाल लेती है। जहाँ सविता सुधीर की पत्नी से कहीं अधिक जज साहब की पुत्रवधू है वहीं दूसरी ओर शांत स्वभाव की रेवा सुधीर की बहन से कहीं अधिक जज साहब की पुत्री है।

वंशज उपन्यास में पात्रों के मध्य के संवाद उनके आपसी संघर्षमय सम्बन्धों को सफलतापूर्वक उजागर करते हैं। बंधन किसी को पसंद नहीं आता। सुधीर अपने पिता के अनेक बन्धनों से छुटकारा पाना चाहता है। वह स्वतंत्रता से अपने मूल्यों तथा विचारों के अनुरूप जीना चाहता है। संघ का सदस्य बनने पर शुक्ल साहब की नाराजगी पर आक्रोश व्यक्त करता हुआ कहता है-

“मैं किसी का गुलाम नहीं हूं। न समाज का न विदेशी सत्ता का। मैं स्वतंत्र हूं, डैडी, मुझ पर विश्वास कीजिए। मैं स्वतंत्र रहकर ही प्रगति कर सकता हूँ।”

औद्योगीकरण देश की प्रगति में बहुत ही महत्त्वपूर्ण रहा, पर साथ ही इससे बहुत से मजदूरों का आर्थिक शोषण भी हुआ है। इससे वर्ण संघर्ष की भावना भी बढ़ी है। सुधीर को जब पता चलता है कि ठेकेदार मजदूरों से ढ़ाई रुपये पर अंगूठा लगवाकर केवल एक रुपया ही देता है, तब सुधीर ठेकेदारों के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करता है। वह कहता है-

“पागल? पागल किसे कह रहे हैं. मिस्टर भादुड़ी? आप समझते क्या है? गरीब, भूखे-नंगे मजदूरों को बेचकर खा जायेंगे |

उपन्यास का परिवेश

‘वंशज’ उपन्यास का परिवेश स्वातंत्र्योत्तर है। उसके अनुरूप ही जज साहब के घर के माहौल को दर्शाया गया है। जज साहब के ठाठ-बाट, रहन-सहन एवं कायदे-कानून आदि का भलीभाँति चित्रण किया गया है। उपन्यास में गाँधी की हत्या, नारी शिक्षा, मजदूरों पर हो रहे अत्याचार, आजादी की लड़ाई आदि पहलुओं को उजागर किया गया है। आजादी की लड़ाई के लिए हो रहे संघर्ष को देखकर सुधीर का मन अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रोध से भर जाता है।

वंशज उपन्यास की भाषा

वंशज उपन्यास की भाषा पात्रानुकूल है। भाषा के माध्यम से पात्रों की मनोदशा एवं माहौल का पता चलता है। उपन्यास के अधिकतर पात्र शिक्षित हैं। उनकी शिक्षा दिक्षा का प्रभाव उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा में भी परिलक्षित होता है। इस उपन्यास में मृदुला जी ने कहीं कहीं सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया है। सविता और सुधीर के मध्य चलने वाले प्रणय को सांकेतिक भाषा में शब्दबद्ध करते हुए लिखती हैं-

“सुधीर और सविता शयनकक्ष एकांत में मिलते रहे, पति-पत्नी का व्यापार निभाते रहे। केवल कर्तव्य समझकर नहीं, प्रकृति के नियमों से अभिभूत होकर भी… दिन में अपने-अपने क्षेत्र में, वे एक-दूसरे से जूझते और सूरज छिपने पर, हथियार डालकर, रात भर के लिए संधि कर लेते।”

सांकेतिक भाषा के अतिरिक्त अलंकारिक भाषा का भी प्रयोग किया गया है। उदाहरण के तौर पर –

उनकी एक डांट में अपने को देशप्रेमी कहने वाला नवयुवक-दल गुब्बारे में सुई चुभ जाने जैसा पिचककर रह गया था।’

इस उपन्यास के पात्र जज साहब की भाषा में उनके अंग्रेजियत युक्त से व्यक्तित्व के अनुरूप ही, अंग्रेजी भाषा के शब्दों की बहुतायता दिखाई देती है। जैसे- “गेट आऊट ऑल ऑफ यू।””

वंशज उपन्यास की शैली

वंशज उपन्यास में अधिकतर वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है। साथ ही संवादात्मक शैली के भी उदाहरण मिल जाते हैं। पिता-पुत्र के बीच हुए। संवाद इसके उदाहरण हैं। “सोने से पहले कुछ देर पढ़ना उनका प्रतिदिन का नियम है। उनका हर काम नियमित समय पर होता है।” इस प्रकार शुक्ला साहब की दिनचर्या का वर्णन, वर्णनात्मक शैली में किया गया है।


Dr. Anu Pandey

Assistant Professor (Hindi) Phd (Hindi), GSET, MEd., MPhil. 4 Books as Author, 1 as Editor, More than 30 Research papers published.

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