ग्लेशियर से : मृदुला गर्ग | ‘Glacier se’ By : Mridula Garg

ग्लेशियर से : मृदुला गर्ग | ‘Glacier se’ By : Mridula Garg

ग्लेशियर से कहानी संग्रह में अलग-अलग विषयों से सम्बन्धित कुल सोलह कहानिय संग्रहित हैं जिनका परिचय निम्न प्रकार से है |

कहानी संग्रह का नामग्लेशियर से (Glacier se)
लेखक (Author)मृदुला गर्ग (Mridula Garg)
भाषा (Language)हिन्दी (Hindi)
प्रकाशन वर्ष (Year of Publication)1980

ग्लेशियर से कहानी संग्रह की कथा-वस्तु

ग्लेशियर से

ग्लेशियर से कहानी में नायिका उषा के उन्माद से भरे जीवन एवं क्रियाकलापों का चित्रण किया गया है | मिस्टर दत्ता से विवाह के बाद भी उषा का उत्साह जारी रहता है | वह अपने पति मिस्टर दत्ता के साथ सोनमर्ग का ग्लेशियर देखने जाती है | शाम का वक्त हो जाने और मि. दत्ता के थके होने के कारण वे दो मील दूर ग्लेशियर देखने जाने से इन्कार कर देते हैं किन्तु उषा अकेली ही ग्लेशियर की ओर बढ़ जाती है | जहाँ उसकी मुलाकात पठान से होती है | पठान उसे स्लेज गाड़ी पर बिठाकर नदी पार करवाता है | स्लेज पर बैठी उषा पठान की कमर को अपनी दोनों टांगों से कसकर पकड़ लेती है | नदी पार करने पर वह बेहोश हो जाती है बेहोशी के खत्म होने पर वह पठान को खोजती है |  उसी समय मि. दत्ता उसे ढूंढ़ते हुए वहाँ आ पहुँचते हैं और वे दोनों घोड़े पर सफर करते हुए वापस होटल लौट जाते हैं |

झूलती कुर्सी

झूलती कुर्सी कहानी में नायिका शेफाली के प्रणयानुभूति का चित्रण किया गया है | शेफाली झूलती कुर्सी पर बैठी अपने प्रेमी का इंतजार करती रहती है | वह अपने प्रेमी से रेम्बल रेस्तरों में मिलने का वादा करती है किन्तु रेस्तरों में पहुँचकर भी वह अपने प्रिय को नहीं देख पाती जिससे वह घर वापस लौट आती है | घर आकर अपने प्रेमी से फोन पर बात करने पर उसे ज्ञात होता है कि वह भी दो घंटे से उसी रेस्तरों में ही था शेफाली उसे मिलने के लिए अपने घर बुलाती है और झूलती कुर्सी पर बैठी अपने प्रिय का इंतजार करती है |

टोपी

टोपी कहानी के माध्यम से समाज के राजनीति में फैले भ्रष्टाचार, ढोंगी नेताओं, अवसरवादिता आदि पर करारा व्यंग्य किया गया है | इस कहानी में स्वार्थ और बेईमानी कर रहे गांधी टोपी धारी ओं का पर्दाफाश किया गया है | इस कहानी का नायक अविजित बंसल एक सच्चा गांधीवादी नेता है | वहीं उसका मित्र सरण कुमार गांधी टोपी के सहारे देशसेवा का ढोंग करता है | अविजित को अपने मित्र की स्वार्थी प्रवृत्ति की जानकारी होने तथा चड्ढा की मृत्यु पर उसके प्रति दिखावे की सहानुभूति पर उसे कोच आता है | किन्तु बसल जानता है कि उसकी फैक्ट्री के लिए आवश्यक लाइसेंस मात्र सरण कुमार के सहयोग से ही मिल सकता है | अतः वह भी परिस्थिति से समझौता कर लेता है |

तुक

तुक कहानी में नायिका मीरा के मोहभंग को दर्शाया गया है | दरअसल मीरा का यह मोहभंग तब होता है जब उसे पता चलता है कि वह तो अपने पति से प्रेम करती है, किन्तु उसका पति उससे उस तरह प्रेम नहीं करता जिसकी उसे अपेक्षा होती है | मीरा पूर्ण रूप से अपने पति के प्रति समर्पित है, किन्तु उसका पति नहीं |

तुक कहानी के नायक नरेश को ब्रिज खेलने का बेहद शौक है | शादी के बाद नरेश मीरा को अपने साथ ब्रिज खेलने के लिए बाध्य करता है |  मीरा तास के पत्ते को हाथ में लेते ही जड़ सी हो जाती है | मीरा भी एक सामान्य भारतीय नारी की तरह अपने पति को खुश रखने का प्रयास करती है, किन्तु ऐसा नहीं हो पाता है |

एक दिन मीरा द्वारा परेशान करने पर वह हारकर घर लौटता है और मीरा को डाट डपटकर ब्रिज की किताब पढने लगता है | मीरा लाख जतन करने पर भी पति को खुश नहीं रख पाती | वह सोचती है- “मैं इस युग में मिसफिट हूं” अन्ततः मीरा अपने आप को पति से एकतरफा प्यार करने वाली मूर्ख औरत समझती है, फिर भी वह नरेश से समर्पण भाव से प्रेम करती है |

होना

होना कहानी में प्रेम में वशीभूत नायिका की मनोदशा का चित्रण किया गया है | कहानी की नायिका दो साल से अपने प्रिय के पत्र के इंतजार में है | यह अर्थात् नायिका अपने प्रिय की कोई खबर न मिलने पर उसके अस्तित्व को लेकर आशंका में डूबी रहती है | यह वकील द्वारा अपने प्रेमी की कोई खबर न पाकर दुःखी होती है | उसे लगता है कि जैसे उसका अपना अस्तित्व ही समाप्त होता जा रहा है | किन्तु एक दिन अपने प्रेमी के जीवित होने के सबूत को पाकर फिर उसका मन उसे पाने की आशा से भर जाता है |

उल्टी धारा

उल्टी धारा कहानी में भी टोपी कहानी की ही भाँति गांधीवादी ढोंग करने वाले दलबदलू नेताओं पर व्यग्य किया गया है | श्याम सिंह होली के दिन भारत चीन युद्ध के दौरान किस प्रकार उसकी प्रेम की दवा काम आयी थी यह बतलाता है | इसी के द्वारा उसने प्रेमा को भी शादी के लिए तैयार किया था | प्रेमा शुरू में श्याम सिंह से नफरत करती थी | किन्तु रसोईए द्वारा दवा मिला दूध पीने पर प्रेमा पर उसका जादुई असर होता है और वह खदर छोड़ रेशमी साड़ी पहनने लगती है तथा अंग्रेजी में बातें करने लगती है साथ ही श्याम सिंह से शादी करने के लिए तैयार हो जाती है | इसी तरह एक दिन दवा मिले मास के टुकड़े को खाकर जनरल व्याग भी लड़ाई बंद कर देता है |

खरीदार

खरीदार कहानी में नारी के आधुनिक विचारों का अंकन किया गया है | साथ ही यह भी दिखलाया गया है कि नारी अपने संकल्प शक्ति के बल पर कुछ भी हासिल कर सकती है | जैसा कि इस कहानी की नायिका नीना करती है | साधारण सी दिखने वाली नीना का ब्याह बीस हजार रुपये में तय होता है, किन्तु नीना इस तरह बिकने के लिए राजी नहीं होती | वह अपनी माँ से इस विवाह के लिए मना कर देती है और एक दिन स्वयं खरीदार बनने का संकल्प लेती है |

अपने संकल्प को मूर्तरूप देते हुए नीना काफी संघर्षों के बाद आई ए. एस. की परीक्षा को उत्तीर्ण करती है | पदोन्नति को प्राप्त कर गृहमंत्रालय में संयुक्त संचिव के पद पर नियुक्त होती है | अपने अकेलेपन के समय में उसे सुनील का साथ अच्छा लगता है किन्तु वह सुनील के शादी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है | अपने ओहदे, पैसे वगैरह के बल पर वह एक खरीदार बनकर सुनील को कभी भी बुलवा सकती है |  यहाँ नीना के रूप में आधुनिक विचारों से प्रभावित नारी का चित्र प्रस्तुत किया गया है |

संज्ञा

संज्ञा कहानी में नायिका में के चेतन मन की अपूर्ण इच्छाएँ अवचेतन मन में बार-बार उभरती रहती हैं | नायिका अपने बारह वर्ष से बिछुड़े प्रेमी को याद कर शीशे में स्वयं को देखती रहती है और स्वयं से बातें करती रहती नायिका अपनी दमित इच्छाओं को स्वप्न या आत्मचिंतन द्वारा पूर्ण करना चाहती है | इस कहानी में फ्रायड के मनोविश्लेषण सिद्धांत का प्रभाव परिलक्षित हुआ है |

सार्त ने कहा

प्रस्तुत कहानी सामान्य लोगों के प्रति सहानुभूति रखने काले बुद्धिजीवियों को सामने लाती है | वास्तव में इन बुद्धिजीवियों को सामान्य जन मानस के प्रति न तो सभी हमदर्दी है और न ही दया का भाव यही इस कहानी का मूल कथ्य है |

प्रतिष्वनि

प्रतिध्वनि मृदुला जी द्वारा रचित एक काव्यात्मक कहानी है | इस कहानी में जनता यानी सामान्य जन मानस को अपनी-अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जागृत करने का प्रयास किया गया है | इस कहानी में अंग्रेजी सभ्यता, भ्रष्ट नेताओं आदि पर करारा व्यंग्य किया गया है |  

अलग-अलग कमरे

पारिवारिक सम्बन्धों में ठण्डापन और नई तथा पुरानी पीढ़ी के मध्य के संघर्ष आदि समस्याओं को इस कहानी में चित्रित किया गया है | एक आदर्श पिता के रूप में डॉ. नरेन्द्रदेव अपने बच्चों के सुख सुविधा के प्रति विशेष ध्यान देते हैं | उन्हें किसी भी प्रकार का कष्ट न सहन करना पड़े इसका हमेशा ख्याल रखते हैं किन्तु उनकी संताने स्वार्थीवृत्ति की हैं |

डॉ. नरेन्द्रदेव का व्यक्तित्व जुझारू है | कठिन परिश्रम कर वे ऊँचा मुकाम हासिल करते हैं | वे गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता करते हैं |  उनका पुत्र ‘सुरेन्द्रदेव लालची प्रकृति का व्यक्ति है |  वह न तो गरीबों का मुफ्त इलाज करता है और न ही उनके प्रति किसी प्रकार की सहानुभूति रखता है | नरेन्द्रदेव की कोई भी संतान ऐसी नहीं है जिनमें उन जैसे गुण हों | सभी अपनी-अपनी इच्छा के अनुरूप ही कार्य करते हैं |

उनकी पुत्री उषा उनके दत्तक पुत्र वंशीधर से ही विवाह कर लेती है | दूसरी पुत्री आशा उनकी संपत्ति में से अपना हिस्सा मांग लेती है |  सुरेन्द्रदेव पैसों की वजह से पिता के मित्र का इलाज नहीं करता जिससे उनकी मृत्यु हो जाती है | अपने पिता की तरफ भी वह ध्यान नहीं देता |  अन्ततः लकवाग्रस्त डॉ नरेन्द्रदेव अपने स्वार्थी पुत्र सुरेन्द्रदेव को अपना अलग दवाखाना ढूँढ़ने के लिए कह देते हैं | वे पुत्र को सचेत कर देते हैं कि वे शारीरिक रूप से कमजोर हैं, किन्तु दिमाग आज भी पूर्ण रूप से स्वस्थ है |

खाली

खाली कहानी में दो स्त्री पात्रों एवं उनके दृष्टिकोणों का चित्रण किया गया है | इस कहानी की नायिका निर्मला एक गृहिणी है उसके परिवार ने पति और तीन बच्चे हैं | घर का सारा काम करने के बावजूद निर्मला का काफी समय खाली रहता है और इस खाली समय में वह अपने पड़ोस के घर में झांकती रहती है | वहीं नई आयी किरायेदार जिनका कोई बच्चा नहीं है तथा पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं | उन दोनों के पास बिल्कुल भी समय नहीं है | निर्मला नये आये किरायेदार से रिश्ता स्थापित करने की कोशिश करती है लेकिन वह अपनी कोशिश में कामयाब नहीं हो पाती |

अंधकूप में चिराग

अंधकूप में चिराग नामक कहानी में अंधेरे में जी रहे लोगों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की गई है |  इस कहानी की प्रमुख पात्र मैं संघर्षशील नारी है | कहानी में उसके अंतर्बाह्य संघर्ष को दिखाया गया है | उसे अंधेरे में जी रहे लोगों के प्रति सहानुभूति है |

गूंगा कवि

गूंगा कवि कहानी में नायक गोपालदास एक कवि हैं | यह कहानी व्यंग्यपरक कहानी है | गोपालदास को तीन-तीन भाषाओं का ज्ञान है, परन्तु वे गूंगे हैं | उर्दू में बी.ए और अंग्रेजी में एम.ए. की पढ़ाई करने के बावजूद ये इन दोनों भाषाओं में प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्ति नहीं कर पाते हैं | गोपालदास की बचपन की बोली उनके द्वारा सीखी गई अन्य दोनों भाषाओं के बोझ से दब चुकी थी |

अदृश्य

अदृश्य कहानी में वैवाहिक जीवन की जड़ता का चित्रण किया गया है | वैवाहिक जीवन में यदि जड़ता आ जाये तो वह पति तथा पत्नी दोनों के लिए बोझ बन जाता है और ऐसे वैवाहिक बंधन ज्यादा दिन नहीं टिक पाते | कहानी नायिका वीना पर पुरुष के साथ सम्बन्ध स्थापित करती है जिसके कारण उसके पति डॉ देवेन के लिए बीना का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता | देवेन भी अपर्णा नामक स्त्री के प्रति आकर्षित होता है |  अपर्णा देवेन को बीना से तलाक लेकर उससे विवाह करने के बारे में कहती है किन्तु देवेन तैयार नहीं होते, लेकिन जब बीना का खून हो जाता है तब देवेन अपर्णा को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेते हैं |

एक चीख का इंतजार

एक चीख का इंतजार कहानी में बड़तला कहानी के समान ही नारी की प्रसव पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया गया है | कहानी नायक सुरेश की पत्नी प्रसव पीड़ा से बेचैन है | सुरेश अपनी भाभी के साथ अस्पताल में आया है | भाभी उस पीड़ा से भलीभाँति परिचित है | अन्ततः सुरेश की पत्नी ऑपरेशन से एक स्वस्थ लड़के को जन्म देती है | उस बच्चे की चीख सुन भाभी का अशात मन शांत होता है | सुरेश बेटे के जन्म से गर्व का अनुभव करता है | मृदुला जी ने इस कहानी में नारी की इस पीड़ा के प्रति अपनी गहरी सहानुभूति व्यक्त की है |

ग्लेशियर से कहानी संग्रह के पात्र

ग्लेशियर से कहानी संग्रह में संग्रहित कहानियों में पात्रों के तनाव, नारी की मानसिकता, नई एवं पुरानी पीढी का संघर्ष एवं वैवाहिक जीवन की अनेक समस्याओं का चित्रण हुआ ग्लेशियर से कहानी की नायिका मिसेज दत्ता विवाह पूर्व एक जिन्दादिल लड़की थी | उसके लिए जीवन का हर पल एक उत्साह, एक उमंग था और इसी उमंग के साथ वह जीती थी | लेकिन विवाह के बाद वह अपने पति के अनुरूप ही जीने लगती है | अपने पति के साथ वह ग्लेशियर देखने जाती है | शाम के समय अकेली ही ग्लेशियर देखने चली जाती है जहाँ एक पठान उसे नदी पार करवा के ग्लेशियर दिखाता है |  इन सबसे मिसेज दत्ता अपने जीवन में नये बिल का अनुभव करती हैं | कहानी में मिसेज दत्ता स्वच नारी का प्रतिनिधित्व करती है | झुलती कुर्सी कहानी में नायिका शेफाली की प्रणय भावना को दर्शाया गया है | झूलती कुर्सी में बैठ बढ़ी बेसब्री से अपने प्रिय का इंतजार करती है | प्रिय के न मिलने पर व्याकुल हो उठती है |

खरीदार कहानी की नायिका नीना एक प्रबुद्ध और शिक्षित युवती है विवाह बंधन में विश्वास नहीं करती | नीना एक साधारण सी दिखने वाली युवती है | विवाह के समय लड़के वालों की तरफ से दहेज मांगे जाने पर नीना विवाह करने से इन्कार कर देती है और जी जान से मेहनत कर वह गृहमन्त्रालय में संयुक्त सचिव जैसे ऊँचे पद तक पहुँचकर स्वयं को खरीदारों की श्रेणी में सुमार कर लेती है | इस प्रकार नीना एक स्वतंत्र विचारों वाली कर्मठ स्त्री है | अपने पति के सुख में सुखी रहने वाली तुक कहानी की नाविका मीरा अपने वैवाहिक जीवन से निराश है |  पति को खुश रखने के लिए लाख प्रयत्न करने पर भी अफल होती है | किन्तु फिर भी उसका पति उसके प्रेम को नहीं समझ पाता जिससे मीरा निरन्तर तनाव महसूस करती है | इस कहानी संग्रह में संग्रहित कहानियों के प्रमुख पुरुष यात्रों में मिस्टर देता अविजित बसल, नरेश, डॉ नरेन्द्र डॉ. देवेन और सुरेश जादि है | डॉ नरेन्द्र देव एक बेहद स्वाभिमानी मेहनतकश तथा संवेदनशील व्यक्ति हैं | गूंगा कवि के नायक गोफलदास को तीनों का ज्ञान होने पर भी वह किसी भाषा में पूर्ण रूप से प्रभावी अभिव्यक्ति नहीं कर पाता |

ग्लेशियर से कहानी संग्रह के संवाद

इस संग्रह की कहानियों के संवाद के माध्यम से पात्रों की मन स्थिति उनके तनावपूर्ण जीवन भ्रष्टाचार तथा संघर्ष आदि का चित्रण हुआ है | वैवाहिक जीवन के तलावपूर्ण स्थिति को तुक, अदृश्य आदि कहानियों के संवाद के माध्यम से जाना है तुक कहानी का नायक नरेश अपनी पत्नी मीरा को ब्रिज खेलने के लिए विवश करता है | उसे गाड़ी चलाना सिखाता है |  टोपी कहानी में भ्रष्ट राजनीति का पर्दाफास किया गया है | खादी का कुर्ता और गांधी टोपी पहने हुए सरण को देख अविजित ने पूछा यार तू ढंग के कपड़े क्यों नहीं पहनता ? उसके मुंह से निकला | “क्या मतलब?” सरण बोला |

“अंग्रेज गए. स्वराज आ चुका, फिर गांधी टोपी लगाने की क्या तुक

हुई मला? क्यों ? सभी लगाते हैं | “

सभी नेता लगाते हैं |  पर तू नेता तो नहीं है | “

हम तो भैया, गांधीजी को मानते हैं |  खादी बुनना छोड़ दोगे तो स्वराज भी नहीं रहेगा |

ग्लेशियर से मृदुला गर्ग

अलग-अलग कमरे कहानी में पिता पुत्र के संवाद उनके बीच आपसी संघर्ष और तनाव को उद्घाटित करते हैं | नरेन्द्रदेव के मित्र पाठक को फालिज मार देने पर जब उनका बेटा सुरेन्द्र देव को बुलाने आता है, किन्तु फीस के पैसे न होने पर सुरेन्द्र उसे वापस लौटा देता है | यह जानकर नरेन्द्र देव अपने बेटे से कहते हैं –

“जानता नहीं, पाठक मेरे जिगरी दोस्त हैं |  उनसे फीस लेगा?

आपका तो पूरा बरेली शहर जिगरी दोस्त है |  किस-किसका लिहाज करू? “

ग्लेशियर से मृदुला गर्ग

सुरेन्द्र ने कहा

ग्लेशियर से कहानी संग्रह का परिवेश, भाषा और शैली

ग्लेशियर से कहानी संग्रह की कहानियाँ युगीन परिवेश को लेकर लिखी गई है | जहाँ टोपी, उल्टी धारा आदि कहानियों में सामाजिक, राजनीतिक आदि बुराईयों का पर्दाफाश किया गया है, वहीं तुक, अदृश्य आदि कहानियों में वैवाहिक समस्याओं को उजागर किया गया है |  अलग-अलग कमरे, खाली आदि कहानियाँ अकेलेपन को लेकर लिखी गई हैं |  

इस कहानी संग्रह के अधिकतर पात्र सुशिक्षित है, अतः उनकी भाषा भी इसी अनुरूप है | इस संग्रह की कई कहानियों में व्यंग्यात्मक भाषा का प्रयोग किया गया है | डॉट्स भाषा का भी प्रयोग कई कहानियों में हुआ है | टोपी कहानी से एक उदाहरण द्रष्टव्य है- शट-अप अविजित ने तड़पकर कहा,” चले जाओ यहां से |

इस संग्रह की कहानियों में विविध शैलियों का प्रयोग किया गया है | झूलती कुर्सी, अलग-अलग कमरे कहानी में वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है | तुक कहानी आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई है |


Dr. Anu Pandey

Assistant Professor (Hindi) Phd (Hindi), GSET, MEd., MPhil. 4 Books as Author, 1 as Editor, More than 30 Research papers published.

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