विस्थापन का खट्टा-मीठा पारितोष – ‘वाकिंग पार्टनर’ | Walking Partner Kahani Sangrah by Usha Raje Saxena

विस्थापन का खट्टा-मीठा पारितोष – ‘वाकिंग पार्टनर’ | Walking Partner Kahani Sangrah by Usha Raje Saxena

विस्थापन की वृत्ति प्रकृति प्रदत्त हर जीवों में देखी जा सकती है | फिर चाहे इसका मूल कारण आस-पास के भौगोलिक परिवेश में बदलाव हो, अथवा जीविका की जद्दोजहद | इतिहास में जहाँ इस वृत्ति के साक्ष्य भलीभांति परिलक्षित होते हैं वहीँ दूसरी ओर विज्ञानं इससे सम्बंधित तर्कों की वैज्ञानिक दृष्टि से पुष्टि भी करता है | जीव चाहे जलचर हो, नभचर हो या थल पर निवास करने वाले, आजीविका की तलास में वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित होते रहे हैं |

मनुष्य भी इस वृत्ति से अछूता नहीं रहा है | जंगलों में रहने वाला मानव जब कृषि की ओर अग्रसर हुआ तो जल की अधिक आवश्यकता और उपजाऊ मृदा आदि की तलास में नदियों की ओर पलायित हुआ | इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप कहीं उसकी जीवन शैली में उत्थान हुआ तो कहीं तो कहीं पतन | उनके विचारों में कभी नवीनता आयी, वैचारिक दृष्टी से उत्थान हुआ तो कहीं उनके अपने सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं, व्यवस्था आदि में उत्थान और कहीं ह्रास हुआ | विस्थापित होने वाले लोगों ने या तो स्वयं को नई व्यवस्था के अनुरूप ढाल लिया, या तो अपने अनुरूप व्यवस्था को ढाला या फिर एक मिलीजुली संस्कृति का निर्माण किया |

मानव के विस्थापन के मूल में एक अच्छे जीवन शैली की भी महत्वकांक्षा रही है | लोगों में अंतरप्रांतीय अथवा अंतर्देशीय विस्थापन दोनों काफी संख्या में देखे जा सकते हैं | अपनी मातृभूमि से दूर जा बसे लोगों में से कुछ मनचाही तरक्की हासिल कर अपने सपनों को पूरा करने में सफल होते हैं तो कुछ असफल | उनके अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव होते हैं | तरक्की की इस होड़ में व्यक्ति मात्र अपने मूल स्थान से पलायित नहीं होता बल्कि कई बार उसके अपने विचारों, मान्यताओं, सभ्यता और संस्कृति आदि में भी काफी बदलाव आ जाते हैं | इसे बौद्धिक पलायन कहना सही होगा | 

प्रवासी हिंदी साहित्य की धारा में ऐसे कई उदहारण दृष्टव्य होते हैं | विस्थापित लेखकों के अपने खट्टे-मीठे अनुभव उनके अपने रचना संसार के पात्रों की सृष्टी तथा कथानक में रचे-बसे रहते है | गोरखपुर उत्तर प्रदेश में जन्मी तथा विगत तीन दसक से इंग्लैंड में प्रवासी भारतीय के रूप में जीवन यापन करने वाली लेखिका श्रीमती ‘उषा राजे सक्सेना’ की रचनाएँ भी इससे अछूती नहीं हैं | उनकी रचनाओं में प्रवासियों को महत्वकांक्षा, बदलते मूल्यों, सोच, अपनी संस्कृति और सभ्यता से लगाव तथा उनसे विमुखता आदि भली-भांति परिलक्षित होती है | उनका  ‘वाकिंग पार्टनर’ नामक कहानी संग्रह ऐसे ही कई विस्थापितों के मर्म को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है |

रुखसाना

‘रुखसाना’ कहानी की पात्र रूखसाना पाकिस्तान  के एक ऐसे परिवार से आती है जो रोजगार की तलास में ब्रिटेन आ बसते हैं, परन्तु उनकी सोच पर वहां के परिवेश, संस्कृति आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता | अपनी दकियानूसी सोच से वै निजाद नहीं पाते हैं | उनकी जातिगत और धार्मिक कट्टरपन से युक्त सोच थी कि – 

“… लडकियाँ सिर्फ जनानियाँ होती हैं | वे दुनिया में सिर्फ अपने मर्दों की खिदमत और औलाद पैदा करने के लिए आई होती हैं | उन्हें दुनिया के किसी और मरहले से कोई मतलब नहीं होना चाहिए | उनका खाविन्द उनका खुदा होता है जो उनकी जरूरतें पूरी करता है |”

वाकिंग पार्टनर – उषा राजे सक्सेना, पृष्ठ. १६

रूखसाना के पिता बर्तानिया के स्कूलों को हिकारत की नजर से देखते थे | ब्रिटेन की कानून व्यवस्था की बंदिशों का ही परिणाम था की रूखसाना पढ़ लिख सकी और उसमें अपने दम पर जीने पाने का आत्मविश्वास तथा उपर्युक्त दकियानूसी सोच के प्रतिकार का साहस पनपा | मीरपुर में जब रूखसाना की फूफी का अनपढ़ और जाहिल बेटा यानि उसका मंगेतर मंगनी की रात उस पर दरिंदगी करने का प्रयास करता है, तो वह रातो-रात सब कुछ छोड़ ब्रिटेन आने का निर्णय लेती है | बिना किसी को बताये वह पराये देश में अपने बूते अपनी पढाई पूरी करने तथा कुछ करने का साहस करती हैं | जाया उससे कहती है- 

“रूखसाना….. तुमने अपनी पढाई के लिए इतना बड़ा कदम सिर्फ अपने बल-बूते पर उठाया तो फिर तुम्हारी पढाई भला आगे कैसे नहीं जारी रहेगी | अब तो दुनिया की कोई ताकत, तुम्हें तुम्हारे नेक फैसले बदलने को मजबूर नहीं कर सकती |”

वाकिंग पार्टनर – उषा राजे सक्सेना, पृष्ठ. १७

रूखसाना का यह अदम्य साहस, आत्मविश्वास उसके परिवार के विस्थापन के कारण, एक खुले विचारों वाले प्रोग्रेसिव माहौल में परवरिश का नतीजा था | वह अपने समाज की दकियानुसी सोच का प्रतिकार करती है |

वजूद

वाकिंग पार्टनर कहानी संग्रह कहानी की अगली कहानी ‘वजूद’ कुमार मंगलम तथा वैजन्ती नामक पात्र के दाम्पत्य जीवन में आये बदलाव के इर्द गिर्द घूमती है | ब्रिटेन में अपने व्यवसायिक परिवेश के कारण पति कुमार मंगलम में  अपनी संस्कृति और विचारों को लेकर आये बदलाव जिसके कारण पर-स्त्री के साथ सम्बन्ध स्थापित हो जाने के बाद भी पश्चाताप के भाव की गैरमौजूदगी तथा सहज भाव वैजन्ती को अति विचलित कर देती है | अपने पारिवारिक दायित्यों निष्ठा के साथ निभाती वैजन्ती किसी आम भारतीय स्त्री की ही भांति पति का यह कृत्य उसे असहज बना देता है | वह कहती है- 

“कुमार, जिस सहजता से तुम यह बात कह रहे हो, वह मेरे लिए उतनी ही गहरी और गंभीर है | बिना मन के मिले तन का आदान-प्रदान नहीं हो सकता है |” 

वाकिंग पार्टनर – उषा राजे सक्सेना, पृष्ठ. १

उसे पति की भूल से ज्यादा उसे कोई भूल न मानना अधिक सालता है | उसे यह एहसास होता है की कुमार की भूल के लिए वह स्वयं को क्यों प्रताड़ित कर रही है | वह अपने आप से कहती है

“ओह ! वैजन्ती, और कब तक ‘नाइव्’ रहोगी, कब तक यह पलायनवादी सिद्धांत अपनाए रहोगी !  …… यू स्टूपिड वोमन, पुल अप योर सॉक्स …….. अब वह घर में बैठी सिर्फ इंतजार नहीं करेगी” 

वाकिंग पार्टनर -उषा राजे सक्सेना, पृष्ठ. २३

वह स्वयं कुछ करते हुए आत्मनिर्भर बनने का निश्चय करती है | पति की भूल उसमें ऐसा रोष पैदा कर देती है की वह कुछ भी कर गुजरने के लिए तत्पर हो जाती है |

क्लिक

सामान्य तौर पर देखा जाता है की व्यक्ति कितना भी पढ़ लिख ले, परन्तु कई बार आजीवन अपने परिवेश के कारण उत्पन्न होने वाली विचार धारा को नहीं बदल पाता | मसलन कई बार तो ऐसा दोहरा मापदंड भी देखा जाता है की स्वयं सामाजिक दायरों, बंधनों को तोड़ कर वैवाहिक बंधन में बंधने वाले जोड़े अपने बच्चों से इसके विपरीत अपेक्षा रखते हैं | ‘क्लिक’ कहानी के सभी पात्र बहुत ही प्रोग्रेसिव विचारधारा रखते हैं | नायिका ‘तान्या दीवान’ के माता पिता वैसे तो उसके पर्सनल स्पेस की बहुत ही क़द्र करते हैं, किंतु तान्या के विवाह को लेकर उनकी चिंता और प्रतिक्रिया किसी अन्य सामान्य माता-पिता की ही तरह होती है | तान्या इस सन्दर्भ में कहती है – 

“मम्मी वैसे खुले विचारों की है पर वह उस पीढ़ी से सम्बन्ध रखती हैं जो चाहे कितना भी आधुनिक हो जाये फिर भी लड़की की शादी जैसी परंपरा के अधिकार भरे जकड़न के सम्मोहन से मुक्त नहीं हो पाता है |” 

वाकिंग पार्टनरउषा राजे सक्सेना, पृष्ठ. २५

परन्तु इतना हैं की तान्या के माता-पिता के विचार तान्या की पसंद को किसी धर्म, जाती, क्षेत्र, वर्ण, काला-गोरा आदि के बंधनों में जकड़ कर नहीं रखते | उनके खुले विचारों का ही परिणाम था कि तान्या बतौर एक आईटी कंसलटेंट पूर्ण आजादी के साथ अपने व्यवसायिक जीवन में बुलंदियों को हासिल करती है | ऐशली के साथ कुछ समय तक लिवइन रिलेशनशिप में रहती है और बाद में आवश्यकता महसूस होने पर ‘तुहिन’ के साथ अपने माता-पिता की सहमती से शादी करती है | किसी और देश में विस्थापित होने का परितोष ही है कि तान्या और उसके परिवार को अपने अत्यंत ही खुले विचारों के साथ बिना किसी सामाजिक दबाव के जीवन जीने का मौका मिला |

मेरे अपने

‘मेरे अपने’ कहानी की ‘एला’ अपने पिता के डिसिप्लिन और पाबंदियों से ऊब कर घर छोड़ देती है | पहले वह एक वेट्रेस के रूप में काम करते हुए अपना स्वयं का व्यवसाय प्राम्भ करती है तथा नयी उचाईयों को छूती है | वह मर्चेंट एंड मिल्स में पार्टनर बनती है | पिता से पुनः मिलने पर मन की पूरी भड़ास उसके समक्ष रख देती है किन्तु साथ ही उसे यह भी एहसास होता है की सात सालों तक दूर रहने के बावजूद भी उसके मन में अपने पिता के लिए बहुत ही प्रेम है | अंततः वह ‘मिर्ची’ नामक एक हंगेरियन युवक से विवाह कर स्वतंत्र तथा अपने अनुसार जीवन जीती है |

वाकिंग पार्टनर

इस कहानी संग्रह की अगली कहानी ‘वाकिंग पार्टनर’ एक ऐसी स्त्री  की कहानी है जो हर रोज सुबह ‘रिफत’ से मिलती है, उनके बीच संवाद भी होता है परन्तु वे कभी एक दुसरे से परिचय नहीं होता है | वे दोनों एक अच्छे वाकिंग पार्टनर मात्र हैं | रिफत के अनुसार वह स्त्री 

“शायद यूरो कल्चर से प्रभावित होने की वजह से, वे निर्लिप्त-सी, सम्बन्ध बढ़ाने की जरूरत नहीं समझती है | …..हाँ ….कभी कभार वे रिफत को अच्छा श्रोता पा, बदलते हुए मूल्यों तथा सामाजिक विसंगतियों की बातें नपे-तुले शब्दों में करती हैं |” 

वाकिंग पार्टनरउषा राजे सक्सेना, पृष्ठ. ४४

 बाद में रिफत को अपने मित्र तथा बहन शाहीन के माध्यम से ज्ञात होता है की उस स्त्री के पति बीमारी की वजह से लन्दन के एक अस्पताल में लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं | किसी समय में जहानाबाद का जमीदार रहा ये परिवार आज आर्थिक तंगी के दौर में होने के कारण अवांछनीय रोजगार से जुड़ने के लिए विवश हो गया है | पिता के इलाज के लिए उस स्त्री को दोनों बेटियां ‘जरीना’ और ‘करीना’ हाई प्रोफाइल कॉल गर्ल्स बन जाती हैं जो प्राइवेट पार्टिओं में अपने डांस के माध्यम से पैसा कमाती हैं | विस्थापन उनके लिए मुसीबत लेकर आता है |

रिफत की बहन शाहीन अपने जीवन में अकेलेपन से जूझ रही है | टेलीफोन पर हुयी शादी के पश्चात शाहीन जब लन्दन आती है तब बहुत दीनों तक उसे ज्ञात नहीं हो पाता है कि उसके घर में रहने वाली गोरी औरत उसकी मकान मालकिन नहीं बल्कि उसके पति की दूसरी बीवी है | उसे देर से यह बात समझ आती है कि उसके पति ने उससे मात्र विवाह इस लिए किया था ताकि वह उसके घर और सौतन के बच्चों की देख-भाल करे | अपनी दूसरी बीवी के साथ उसका पति दूसरी जगह रहने लगता है तथा उसे शाहीन और उसके मानसिक तौर पर कमजोर बच्चे की कोई परवाह नहीं है |

रिफत जब एम.बी.ए. करने  लन्दन आयी तो मामू नामक युवक भी उसके साथ था जो जूलिया के साथ दोस्ती के उपरांत उसके लिव इन रिलेशन में रहता है | उसके साथ ब्रेकअप के बाद, वीजा ख़त्म होने पर, मुल्क वापस लौटने के खौफ के चलते अपने से दोगुनी और चार बच्चों की माँ एक स्काटिस औरत से विवाह कर लेता है | रिफत स्वयं व्यावसायिक तौर पर लन्दन में सफलता हासिल करती है | शादी के बंधन में विश्वास न करने वाली रिफत का अपने मुल्क से मोह भंग हो जाता है | वह कहती है – 

“क्या रखा है मुल्क में सिवाय अम्मी के |……शादी के बंधन की जरूरत उसे अभी तक महसूस नहीं हुई | जब अकेलापन खलेगा या ममता जोर मारेगी तो मुल्क जाकर अपनी पसंद से अनीस खाला के लड़के या और अच्छे-भले लड़के के साथ ब्याह करके उसे यहाँ ले आएगी | ……वह अम्मी और रिश्तेदारों की पकड़ से हजारों मील दूर बैठी अपनी आजादी को कामगर बना रही है |” 

वाकिंग पार्टनरउषा राजे सक्सेना, पृष्ठ. ५१

रिफत आजाद खयाल लड़की है जो अपने पुरुष मित्र के साथ लिव इन रिलेशन में तो है , परन्तु जब बात विवाह की आती है तब वह अपने देश के नौजवान से ही विवाह का ख्याल रखती है | कहीं न कहीं अपने मुल्क और समाज से पूर्ण-रूपेण मोह भंग नहीं रख पाती है |

महत्वकांक्षी मयंक

‘महत्वकांक्षी मयंक’ कहानी ‘मयंक’ नामक एक ऐसे युवक की कहानी है जो किसी आम प्रवासी की ही  भांति विदेश जाकर सफलता की बुलंदियों को हासिल करने की महत्वकांक्षा रखता है | उसके अन्य मित्र वहां बसने के लिए परमानेंट वीसा हासिल करने के उद्देश्य से उसे किसी  ब्रिटिश-बोर्न या अंग्रेज लड़की से शादी की सलाह देते हैं | इस सलाह से असहमत मयंक  किसी अंग्रेज लड़की से शादी न करने का निर्णय करता है | हिन्दू समाज की लड़की ‘अंजलि’ से उसका मेल-मिलाप अंतत विवाह का रूप लेता है |

लन्दन में पली-बढ़ी अंजलि खुले विचारों की तो थी परन्तु अपनी ‘बा’ से मिले संस्कारों के कारण भारतीय मूल्यों से विमुख नहीं हुई थी और भारतीय संस्कृति को बेहद ही पसंद करती थी | वेजेज क्लर्क की नौकरी छुटने से हतास मयंक अंजलि से अपने बच्चे को अबो्र्ट करने की बात करता है | सुलझे विचारों वाली अंजलि उसे हतासा और निरासा से बाहर निकालती है तथा चुटकियों में इस समस्या का समाधान देती है | मकान में पेइंग गेस्ट रखने के साथ-साथ स्टाल लगाने की न सिर्फ युगत देती है बल्कि पति मयंक के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर उस व्यवसाय को स्थापित करने में पति मयंक का भरपूर साथ भी देती है |

धीरे-धीरे उनके व्यवसाय इतना बड़ा हो जाता है की वे विदेशों में भी अपना कारोबार स्थापित करते हैं | विदेश में रहते हुए भी अपनी संस्कृति से जुड़े मूल्यों का पालन उनकी सफलता का रहस्य था , इस बात से मयंक अनभिज्ञ था किन्तु अंजलि नहीं | अपनी सफलता के चरम पर मयंक  अति महत्वकांक्षी हो गया | अंजलि – 

“ मयंक के तौर-तरीके और आचार-विचार में आ रहे तेज परिवर्तन से बेचैन हो उठी | उसे भविष्य में आने वाले किसी संकट का आभास हो रहा है | मयंक का व्यापर और धन के प्रति मोह बढ़ता ही जा रहा है | ऐसी भी धन की क्या लालसा कि मनुष्य अपने धर्म, संस्कृति और भाषा-संस्कार को ही बलाए ताख रख दे |” 

वाकिंग पार्टनरषा राजे सक्सेना, पृष्ठ. ६०-६१

अंजलि की सारी चिंता पुत्री अनन्या जो अब किशोरी हो चुकी थी, उसको आया डैनियाला से मिल रहे संस्कारों को लेकर थी | बढ़ते व्यवसाय के चलते तरह-तरह के लोगों के उसके घर-परिवार में बढ़ रहे घुसपैठ से जहाँ अंजलि चिंचित थी वहीँ मयंक बेहद बेपरवाह | जब कार्टर के द्वारा अनन्या की अभद्र तस्वीरें और विडियो बनाने का प्रयास किया जाता है तब मयंक एक जिम्मेदार पिता की तरह उसके प्रयास को असफल करते हुए अपनी बेटी को बचाता है और अंजलि की सूझ-बुझ की मन ही मन तारीफ करता है | इस कहानी के मूल पात्र अपने चारित्रिक एवं वैचारिक  विस्थापन को नकार देते हैं और अपनी सभ्यता और संकृति से जुड़े रहते है |

दर्द का रिश्ता

‘दर्द का रिश्ता’ कहानी की नायिका ‘मंजरी’ का बचपन में ही पिता की मृत्युपरांत  तेरहवी के दिन ही चचेरे भाई और उसके मित्र द्वारा अवांछित कर्म के चलते उसके जीवन का अमन-चैन  लुट गया था | उसे और उसकी माँ को कानपुर आने के उपरांत समाज-सुधारक लाला दीनदयाल गुप्ता के घर शरण मिली | उन्होंने मन-ही-मन मंजरी को अपनी बहु बनाने की ठान ली | गुप्ता जी के बेटे ‘मिहिर’ के लन्दन से लौटने के उपरांत, मंजरी से विवाह के प्रस्ताव पर वह मंजरी से अपनी अनजान बीमारी की बात करता है किन्तु मंजरी बड़ी ही सहजता से उसे गौड़ मानते हुए आजीवन उसका साथ निभाने की बात करती है | मिहिर द्वारा इंग्लैंड के परिवेश का जिक्र अंजलि को वहां विस्थापित होने के लिए तथा उसे ही अपनी कर्म भूमि बनाने के लिए  लालायित कर देता है | यथा  

“सच कहूँ तो इंग्लैंड एक विचित्र देश है | एक ओर जहाँ वह अतिभौतिकवादी है वहीँ दूसरी ओर अत्यंत उदार, कार्त्व्यनिस्ठ और श्रेष्ठ सेवाभाव को समर्पित भी है | ……….फिर तो इंग्लैंड मेरी मनपसंद जगह है | …….मैं अपना जीवन दीन-दुखियों की सेवा को समर्पित करना चाहती हूँ | यहाँ मैं पर-कटे पंछी-सा असहाय महसूस करती हूँ | मुझे कोई कुछ करने ही नहीं देता है, लड़की हूँ न ! ….” 

वाकिंग पार्टनरषा राजे सक्सेना, पृष्ठ. ८५

विवाहोपरांत इंग्लैंड लौटने पर उन्हें ज्ञात होता है की मिहिर को एड्स है | सख्तजान मंजरी रोने-धोने की बजाय मिहिर का उसके अंतिम समय तक साथ निभाने का निर्णय लेती है | मंजरी को विस्थापन जहाँ एक ओर एक दुखद दाम्पत्य जीवन देता है वहीं  दूसरी ओर अपनी कर्मभूमि के रूप में एक स्वतन्त्र वातावरण प्रदान करता है |

मजहब

‘मजहब’ कहानी ‘जेबा’ नामक एक ऐसी लड़की की कहानी है जो एक ऐसे परिवार से आती है जहाँ मजहब और उसके  अच्छे-बुरे पहलुओं को बिना किसी तर्क के सर्वोपरि माना जाता है | जेबा पाकिस्तान के मीरपुर से विस्थापित हुए बेहद ही रूढ़िवादी एवं अपरिवर्तनवादी दम्पति की बेटी है | उसका पिता जफ़र गोरों से सख्त नफरत करता है | जूही के प्रयासों से उसे स्कूल में बेहद स्वस्थ एवं प्रगिशील वातावरण मिलता है जिससे उसका संपूर्ण विकास प्रारंभ होता है |

कुछ समय बाद जेबा के व्यवहार में नकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगते हैं जिससे जूही के साथ-साथ अन्य शिक्षक भी चिंतित हो उठते हैं | जेबा की माँ से वार्तालाप से जूही को ज्ञात होता है की पाकितान से आई जेबा की दादी के कारण परिवार का वातावरण बदल गया है जिसका असर जेबा के तेवर और व्यवहार पर भी पड़ रहा है | जेबा का जूही से यह पूछना की वह हिन्दू है या मुसलमान इस बात को और पुख्ता कर देता है कि जेबा के मानस में सांप्रदायिक भावना के बीज बोये जा रहे हैं और  

“भोली-भाली जेबा नस्ली और मजहबी बातों का अर्थ और सन्दर्भ न समझते हुए भी उसके भंवर में फंसती जा रही थी | विष के बीज कितनी जल्दी अंकुरित हो जाते हैं | वह जेबा के बदलते रवैये से समझ सकती थी|” 

वाकिंग पार्टनर – उषा राजे सक्सेना, पृष्ठ. १०८

जूही के हिन्दू होने के बारे में जानकर जेबा का उसके प्रति रवैया भी बदलने लगता है | परन्तु जूही द्वारा सिंचित किये गए अच्छाई के बीज और प्रदत्त स्वस्थ वातावरण एक दिन रंग लाते हैं | जब जेबा खेलते हुए गिर पड़ती है तब उस हालत में अपनी टूटी हुई हड्डी के दर्द को भुलाकर जूही से अपनी बेरुखी और नाराजगी के सन्दर्भ में उससे लिपटकर रोते हुए कहती है –

“आई नो मिस यह खुदा का कुफ्र मुझ पर गिरा है | मैंने फूफी-अम्मा की बुरी बातों पर यकीं जो किया की आप गन्दी हैं, गोरे गंदे हैं | यू आर दी बेस्ट |……….”  जूही ने उसे प्यार और ममता से सहलाते हुए कहा, “मैं नाराज कहाँ हूँ जेबा, मैं तो तुमसे बेहद प्यार करती हूँ |……खुदा हम पे मेहर करता है कुफ्र नहीं | बुरा वो होता है जो दूसरों को बुरा कहता है |” ११ 

वाकिंग पार्टनर – उषा राजे सक्सेना, पृष्ठ. ११०

इस कहानी में पाकिस्तानी परिवार के मजहबी लीक पर चलने वाली सोच को इंग्लैंड का उन्मुक्त वातावरण तनिक भी नहीं बदल पाता है वहीँ दूसरी ओर उनकी बेटी जेबा में उस परिवेश के चलते स्वस्थ सोच के बीज अंकुरित होते हैं |

विस्थापन व्यक्ति के भौतिक उत्थान में ही सहायक मात्र नहीं होता है अपितु एक जगह से दूसरी जगह पर जाकर बसने वाले लोग अपनी संस्कृति, सभ्यता और सोच को भी अपने साथ ले जाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप एक मिली-जुली संस्कृति का निर्माण भी होता है | विस्थापन वैचारिक स्तर पर भी लोगों के उत्थान और पतन दोनों का कारण बनता है | प्रवासी हिंदी साहित्य इसका पुख्ता प्रमाण हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं |

                                                                                                           


Dr. Anu Pandey

Assistant Professor (Hindi) Phd (Hindi), GSET, MEd., MPhil. 4 Books as Author, 1 as Editor, More than 30 Research papers published.

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