महेंद्र भीष्म कृत ‘मैं पायल’ उपन्यास | Main Payal Upanayas By : Mahendra Bheeshm

महेंद्र भीष्म कृत ‘मैं पायल’ उपन्यास | Main Payal Upanayas By : Mahendra Bheeshm

साहित्य में वर्तमान समय है विविध विमर्शो का जैसे –दलित विमर्श ,आदिवासी विमर्श और नारी विमर्श आदि | ये सभी विमर्श ऐसे व्यक्तियों के बारे में जिरह कर अपनी मान्यता ,अपने विचार प्रस्तुत करते  हैं जो अपने आप में पूर्ण हैं | जो या तो एक पूर्ण पुरुष हैं या पूर्ण स्त्री, जिनकी  समाज में अपनी एक पृथक पहचान है | स्त्री और पुरुष के इस समाज में एक ऐसा वर्ग भी है जिसे हमारे समाज में किन्नर कहा जाता है | अन्य विमर्श जहाँ एक पूर्ण स्त्री या पुरुष को समाज की मुख्य धारा में स्थान  दिलाने, उनको हक़ दिलाने के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करते हैं, वहीं एक किन्नर को समाज में किसी तरह का स्थान पाने के पहले उसे समाज में अपनी पहचान के लिए ही अनेकों संघर्षो का सामना करना पड़ता है | चूँकि समाज की दृष्टि में ये अपूर्ण घोषित किये गये हैं अतः ऐसा अपूर्ण व्यक्ति जिस भी परिवार में जन्म लेता है ,या तो उसे अपनी झूठी शान के लिए कहीं फेक बहा या मार दिया जाता है, या उसे समाज एवं परिवार से परित्यक्त कर दिया जाता है किसी किन्नर के पास, जीवन भर भीख मांग कर जीने के लिए | मैं पायल  ऐसे ही एक किन्नर की कहानी है जो अभिशप्त है दर-दर की ठोकरें खाने के लिए, अपनों से अलग-रहने के लिए, कभी भीख मांग कर तो कभी नाच-गाकर  गुजर-बसर करने के लिए |

उपन्यास का नाम (Novel Name)मैं पायल (Main Payal)
लेखक (Author)महेंद्र भीष्म  (Mahendra Bheeshm)
भाषा (Language)हिन्दी (Hindi)
प्रकार (Type) किन्नर विमर्श (Kinnar Vimarsh)
प्रकाशन वर्ष (Year of Publication)2016

पायल अपने परिवार में एक लड़की के रूप में जन्म लेती है | लगातार चार-चार लड़कियों के जन्म से पायल की माँ की कोख को गालियां दी जाने लगीं | उस पर पायल का किन्नर रूप में पैदा होने से उनके सामने अनेक विपदाएं खड़ी हो जाती है | पिता उसके जन्म पर ख़ुशी मनाना तो दूर उसे एक बार देखते तक नहीं | एक किन्नर संतान का पिता होना उनके पुरुषत्व को एक गाली के समान लगता है | पायल के पिता जब भी उसे देखते, उनका खून खौलने लगता | वह पायल को वंश के नाम पर कलंक मानते | पिता द्वारा दी जाने वालीं शारीरिक यातनाएं पायल मूक हो सहती रहती | सर्वप्रथम अपने पिता के मुंह से ही वह अपने लिए हिजड़ा शब्द सुनती है – 

“ जब कभी पिताजी दारू के नशे में कोसते, गाली देते, ‘ये जुगनी ! हम क्षत्रिय वंश में कलंक पैदा हुई है, साली हिजड़ा है …..आदि जाने क्या-क्या वे बकते रहते थे |”

महेंद्र भीष्म – मैं पायल

जैसे-जैसे जुगनी बड़ी होती गयी, उसके जीवन की मुश्किलें भी बढ़ती गयीं | जैसे-तैसे वह कक्षा पांचवी में आती है | किन्तु पिता द्वारा उसका स्कूल जाना भी बंद करवा दिया जाता है | साथ ही जुगनी की माँ  को यह हिदायत भी देते हैं कि जुगनी लड़कों की तरह ही रहे और घर से बाहर कतई  न जाने पाए वरना-

“अगली बार जब मैं आऊँ और यह साला हिजड़ा लड़की के कपड़े पहने मिला और घर के बाहर निकला तो मैं अपने ही हाथों से इस साले का खून कर दूंगा |”

महेंद्र भीष्म – मैं पायल

जुगनी की माँ और बहनें हमेशा उसे पिता की नज़रों से बचाने का प्रयास करती रहतीं | जब भी पिता घर पर होते तो जुगनी को उनके सामने भी नहीं आने दिया जाता | यहाँ तक कि उसे लड़कों के कपड़े ही पहनाये जाते | जब कभी जुगनी के भाई और पिता घर पर नहीं होते तो बहनें उसे लड़कियों की तरह सजातीं और माँ उसकी बलाइयाँ लेतीं | लड़कों के कपड़े पहने जुगनी का स्त्री मन लड़कियों की तरह दिखने के लिए छटपटाता रहता | वह अक्सर खामोश ही रहती | किन्तु जब कभी वह लड़की के कपडे पहनती, बहुत खुश होती | लेकिन जिसके भाग्य में दर्द सहना ही लिखा हो, वे चाहकर  भी खुश नहीं रह पाते, विपत्तियाँ सदा उनसे चार कदम आगे ही चलती हैं | एक बार पिता की अनुपस्थिति में उसकी बहनें उसे लड़कियों की तरह खूब सजाती सवारती हैं और अचानक उसके पिता घर आ जाते हैं | जुगनी को उस रूप में देखकर वे अपना आप खो बैठते हैं और जुगनी को पीटने लगते हैं | यथा –

“पिता जी ने पास रखी बालटी में भरे पानी से मुझे नहला दिया, फिर वहीँ रखी चमड़े की चप्पल को टब में भरे पानी में डुबाडुबाकर मेरे नग्न शरीर की चमड़ी उधेड़ने में लगे रहे  जब तक की मैं बेहोश नहीं हो गयी |”

महेंद्र भीष्म – मैं पायल

अपनी ही संतान के प्रति एक पिता की ऐसी क्रूरता, ऐसा अत्याचार, ऐसी अमानवीयता किसी का भी दिल दहलाने के लिए काफी होता है | फिर जुगनी तो मात्र दस वर्ष की थी | बेतहाशा पिटाई करने पर भी जुगनी के पिता का गुस्सा शांत नहीं होता और वे उसे जान से मारने का  प्रयास करते हैं | उसके गले में रस्सी का फंदा डाल देते हैं | भाग्य कहें या दुर्भाग्य, जुगनी को उसकी माँ बचा लेती है | जुगनी अपनी माँ, बहनों और पिता को उसके कारण समाज में जिस जिल्लत का सामना करना पड़ता है, उससे उन्हें मुक्त करने की सोच वह आत्महत्या करने के लिए घर से निकल जाती है | घर से निकल जाने पर जुगनी को समाज के ऐसे –ऐसे नर भेड़ियों का सामना करना पड़ता है जिसके बारे में न तो उसने सुना था और न ही कभी देखा | आत्महत्या कर वह स्वयं को और अपने परिवार को सदा के लिए समाज से मिलने वाले अपमान से मुक्ति दिलाना चाहती है किन्तु आत्महत्या के प्रयास में सफल ना हो पाने से वह अपना गाँव छोड़कर जाने के लिए एक ट्रेन में बैठ जाती है और यहीं से प्रारंभ होता है उसके जीवन का वास्तविक संघर्ष | ट्रेन में उसे अकेला देख एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति उसके साथ गलत व्यहार करने का प्रयास करता है | यहाँ तक कि जुगनी को पैसे देकर बहलाने फुसलाने का प्रयास करते हुए बीस रूपये का नोट थमा बाथरूम में बुलाता है, किन्तु वह अपने इस प्रयास में सफल नहीं हो पाता | जिनपर लोगों की सुरक्षा का दायित्व हो ऐसे लोग ही यदि रक्षक से भक्षक बन जायें तो समाज में अन्याय, अत्याचार, व्यभिचार और शोषण का बोलबाला बढ़ते देर नहीं लगती | जुगनी जिस प्लेटफार्म पर उतरती है वहां वह स्वयं को अकेला, असहाय महसूस करती है किन्तु जल्द ही उसे वह अनुभव होता है जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी | एक पुलिस वाला ही उसके साथ अभद्र व्यवहार करता है | जुगनी सोचती है –

“हे भगवान ! यह क्या बला है | कैसे-कैसे लोग भरे पड़े हैं समाज में | इससे अच्छा तो मैं मर जाती या घर में पिता जी की मार खाती वहीँ पड़ी रहती |”

महेंद्र भीष्म – मैं पायल

जुगनी इस सभ्य कहे जाने वाले समाज के नर भेड़ियों के बीच  रहने से बेहतर मर जाना या पिता की मार खाते हुए घर में रहना कहीं अधिक अच्छा समझती है | लड़के का कपडा पहन जुगनी लड़की से लड़के का रूप लेती है और स्वयं को नरभेड़ियों की नज़रों से सुरक्षित महसूस करती है | किन्तु वह यह सोचने पर विवश होती है कि एक लड़की से लड़के का कपडा पहन लेने मात्र से कैसे समाज के लोगों का उसे देखने का नजरिया ही बदल जाता है | एक स्त्री का समाज में अकेले जीना पुरुषों की नज़रों से बचना एक स्त्री के लिए कितना मुस्किल होता है वह यह अच्छी तरह से जानती है और सोचती है-

“घर परिवार से दूर होते ही बाहर के समाज में लड़की का रूप  लिये रहना असुरक्षित है …हे भगवान ! यह मैं ही जानती हूँ और जानती होंगी वे सब स्त्रियाँ जो मेरी जैसी स्थति से अक्सर दो-चार होती होंगी या कभी परिवार से अलग-थलग पड़ गयी होंगी | देह के नरभक्षी भेड़ियों की चुभती नज़रों को बड़ी शिद्दत से महसूस किया होगा, जो मांदा गंध के उठते ही खूंखार हो उठते हैं और मौका मिलते ही दबोच लेने के लिए उतावले बने रहते हैं |”

महेंद्र भीष्म – मैं पायल

समाज के लोग चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएँ या कितने भी शिक्षित हो जाएँ किन्तु स्त्री के प्रति समाज का नजरिया अधिकतर हीन ही रहता है जिसे पायल अच्छी तरह समझती है | अपनी माँ, परिवार और गाँव से दूर पायल स्वयं को बहुत ही अकेला, असहाय महसूस करती है और भरे पूरे समाज में रहकर अपनों से अलग अकेला रहना कितना कठिन, कितना जोखिम भरा होता है, वह कोई भी अकेली असहाय स्त्री इस दर्द को समझ सकती है | घर से दूर रहते हुए ऐसी कोई भी जगह नहीं थी जहाँ पायल स्वयं को सुरक्षित महसूस करती | सभी जगह देह के भूखे भेड़िये किसी न किसी तरह उसका शोषण करना चाहते | पायल का संघर्ष धीरे-धीरे और अधिक कठिन हो जाता है | अकेली पायल रेलवे प्लेटफार्म पर कभी भिखारियों के पास रही, कभी अकेले  कभी भर-पेट खाया तो कभी भूखे ही सोयी |

इस संसार में जीव की यदि सबसे बड़ी कमजोरी है तो वह है भूख जिसके आगे प्रत्येक जीव कमजोर पड़ जाते हैं | समस्त संसार के गति का कारण भी कदाचित भोजन की प्राथमिकता ही है | भूख से व्याकुल पायल इतनी लाचार हो जाती है कि खाने के लिये कुछ न मिलने पर लोगों का जूठन तक खाने को विवश हो जाती है | यहाँ तक कि एक यात्री द्वारा फेंके गए बासी खाने को उठा लेती है और खा जाती है | अपने से बिछड़ने का दर्द तथा समाज से मिले अपमान से आहत पायल ऐसे समाज में जीने से अच्छा मर जाना चाहती है किन्तु वह ऐसा नहीं कर पाती है | किन्नर होने में उसका अपना क्या दोष है, जो दर-दर उसे लोगों के द्वारा अपमान का सामना करना पड़ता है | वह सोचती है-

“ हे ईश्वर, ऐसा कौन सा पाप मैंने किया जो तूने मुझे इस जीवन में हिजड़ा रूप दिया |”

महेंद्र भीष्म – मैं पायल

प्रकृति की भूल की सजा पायल पल-पल भुगतती है जिसमें उसका अपना कोई दोष न था | जैसे – जैसे पायल बड़ी होती है उसके संघर्ष के साथ ही उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता चला जाता है | चाय की दूकान पर नौकरी करने से लेकर एक फिल्म प्रोजेक्टर के संचालन तक का सफ़र उसके लिए आसान नहीं रहता  | सबके सामने तो वह लड़के के रूप में रहती है, पर बड़ी होने पर उसे अपनी वास्तविकता पहचान लिए जाने का भय सताने लगता है जिसे छुपाने और अपनी नयी जिन्दगी की शुरूआत करने की आस में वह लखनऊ जाने का मन बनाती है और अपनी वास्तविक पहचान के साथ लखनऊ पहुँचती है जहाँ उसके सामने अनेक कठिनाइयाँ आनी शुरू हो जाती हैं | जबरन उसे किन्नरों के डेरे पर लाया जाता है | उसे विवश किया जाता है बधाई मांगने जाने के लिए | पायल द्वारा ऐसा न करने के लिए कहने पर उसे कई दिनों तक भूखा रखा जाता है | एक बार फिर पायल भूख की विवशता के आगे घुटने टेक देती है |  यहाँ तक कि तबस्सुम नामक एक किन्नर का प्रेमी उसे लोगों के सामने इस हद तक मारता है कि पायल के सारे कपड़े तक फट जाते हैं | लोगों की भीड़  मूक दर्शक बन उसे पीटते हुए देखती रहती है | कोई भी उसकी सहायता के लिए सामने आने का साहस नहीं कर पाता | उसे समाज के तमाशबीन बने इन मर्दों से नफ़रत हो जाती है और वह कहती है – 

“’हिजड़ा’ हम लोगों को कहा जाता है जबकि पुरुष समाज के ये तमाशाई ताली बजाने वाले नामर्द ही ‘हिजड़ा’ कहलाने के सच्चे हकदार हैं |”

महेंद्र भीष्म – मैं पायल

पायल किसी तरह स्वयं को बचाती है | वह मन ही मन अपना बदला लेने की ठान लेती है | जिस जगह उसकी इतनी बेइज्जती होती है, वहां के किन्नर गुरु बन किन्नर समुदाय में फैली बुराइयों को दूर करने का इरादा बनाती है और जिसने उसे लोगों के सामने नंगा कर पीटा था, उससे वह अपना बदला लेती है और तब समाज के वही लोग उसके साहस की सराहना करते हैं जो कभी उसे पीटता हुआ देख मूक बने थे |

पायल के आत्मविश्वास, साहस और उसके दबंग स्वभाव को देखते हुए कई किन्नर उसे अपना गुरु मानने लगते हैं | इस तरह वह किन्नर गुरु बनती है | निःसंदेह पायल अपने साहस और अपने आत्मबल द्वारा ही आज उस मुकाम पर पहुँच चुकी हैं जहाँ पहुँचना किसी किन्नर के लिए आसान बात नहीं है |


Dr. Anu Pandey

Assistant Professor (Hindi) Phd (Hindi), GSET, MEd., MPhil. 4 Books as Author, 1 as Editor, More than 30 Research papers published.

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